This Day, O my dear friend;
In thy life, marks a year complete.
Another cycle finished,
Another milestone achieved.
Pause a little, O dear friend;
Turn around, take a look back
at the path thou hast traveled-
The footmarks that thou left,
Shine with the glory of thy deeds.
The sweat that dripped from thy forehead,
Has turned into beads.
Look down, into the Valley;
From whence thou started thy journey.
People accolade and look in awe,
For the heights thou hast come today.
And indeed, thou hast come a long way!
Scars on thy face,
Are the battles thou fought.
Feathers in thy cap,
Are the battles thou won.
Sword in thy hand,
Are the blessings bestowed.
A moment spared here in recollection,
Is a moment well spent.
Now shall thou continue thy journey,
Thy goal is not yet met.
Look up the hill, O dear friend;
There lies the summit,
Unconquered still!
There lies the goal,
No man has ever achieved before.
The glory is all for thee to seek.
Thy friends shall be thy comrades,
In thy quest to conquer the peak.
Sunday, March 7, 2010
Monday, June 15, 2009
ग़ालिब -The Legend
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ये न थी हमारी किस्मत कि विसाले - यार होता
अगर और जीते रहते यही इंतज़ार होता।
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कितने शीरीं हैं तेरे लब कि रकीब
गालियाँ खाके बेमज़ा न हुआ।
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इश्क से तबीयत ने ज़ीस्त का मज़ा पाया
दर्द की दवा पाई, दर्द- बे - दवा पाया ।
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आगे आती थी हाल -ऐ - दिल पर हँसी
अब किसी बात पर नही आती ।
हम हैं वहाँ, जहाँ से हमको भी
कुछ हमारी ख़बर नहीं आती ।
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हमको उनसे वफ़ा की उम्मीद है
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है ।
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जान तुम पर निसार करता हूँ
मैं नहीं जानता दुआ क्या है ।
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ये न थी हमारी किस्मत कि विसाले - यार होता
अगर और जीते रहते यही इंतज़ार होता।
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कितने शीरीं हैं तेरे लब कि रकीब
गालियाँ खाके बेमज़ा न हुआ।
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इश्क से तबीयत ने ज़ीस्त का मज़ा पाया
दर्द की दवा पाई, दर्द- बे - दवा पाया ।
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आगे आती थी हाल -ऐ - दिल पर हँसी
अब किसी बात पर नही आती ।
हम हैं वहाँ, जहाँ से हमको भी
कुछ हमारी ख़बर नहीं आती ।
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हमको उनसे वफ़ा की उम्मीद है
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है ।
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जान तुम पर निसार करता हूँ
मैं नहीं जानता दुआ क्या है ।
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Monday, November 24, 2008
सीमायें
तुम्हारी सुन्दरता का विवरण करू मैं कैसे ?
मेरी कल्पनायें तो सीमित हैं ।
तुमसे अपने स्नेह को व्यक्त करू मैं कैसे ?
मेरी विवेचनाएँ तो सीमित हैं ।
सावन की पहली फुहार में
अकेले ही भीग गया मैं ।
तुमको निमंत्रण दूँ भी तो कैसे ?
तुम पर मेरे अधिकार तो सीमित हैं ।
दीपक की लौ की भाँती,
इस व्यापक अन्धकार से लडू मैं कैसे ?
मेरे तेजस्कर तो सीमित हैं ।
इस उजडे हुए गुलशन मैं
अब फ़िर से गुल खिलाऊ मैं कैसे ?
मेरे श्रमसाध्य तो सीमित हैं ।
अपने ह्रदय मैं बसी
इन भावानयो को तुम्हे समझाऊ मैं कैसे ?
यह शब्दकोष तो सीमित हैं ।
मरुस्थल की तपित भूमि की भाँती
वर्षा का अनंत इंतज़ार करू मैं कैसे ?
यह जीवनकाल भी तो सीमित हैं ।
Link to my other Blog
http://life-as-it-gets.blogspot.com/
मेरी कल्पनायें तो सीमित हैं ।
तुमसे अपने स्नेह को व्यक्त करू मैं कैसे ?
मेरी विवेचनाएँ तो सीमित हैं ।
सावन की पहली फुहार में
अकेले ही भीग गया मैं ।
तुमको निमंत्रण दूँ भी तो कैसे ?
तुम पर मेरे अधिकार तो सीमित हैं ।
दीपक की लौ की भाँती,
इस व्यापक अन्धकार से लडू मैं कैसे ?
मेरे तेजस्कर तो सीमित हैं ।
इस उजडे हुए गुलशन मैं
अब फ़िर से गुल खिलाऊ मैं कैसे ?
मेरे श्रमसाध्य तो सीमित हैं ।
अपने ह्रदय मैं बसी
इन भावानयो को तुम्हे समझाऊ मैं कैसे ?
यह शब्दकोष तो सीमित हैं ।
मरुस्थल की तपित भूमि की भाँती
वर्षा का अनंत इंतज़ार करू मैं कैसे ?
यह जीवनकाल भी तो सीमित हैं ।
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