जब से याद है, गुलमौहर के वो दो पेड़,
मेरे घर के आगे पहरेदार से खड़े थे ।
सुबह-सुबह जब खिड़की खोलते,
तो अक्सर एक झूलती हुई डाली
एक नया खिला हुआ पुष्प हाथ मैं थमा जाती थी ।
शाम को हवा के हल्के झोंको में,
लहराती हुई टहनियाँ खिड़की पर ऐसे दस्तक देती थी,
मानो खेलने के लिए पुकार रही हो ।
भली भाँति परिचित था मैं,
उन पेड़ो की डालियो, पत्तियों और कलियों से ।
हल्के हरे रंग की नूतन पत्तियां ।
धूल जमी गाड़े हरे रंग की पुरानी पत्तियां
और बूढ़ी होती पीली-भूरी पत्तियां ।
मैं जान ही नहीं पाया, कब एक अंजान सा रिश्ता बन गया
मेरा उन पेड़ों के साथ ।
बचपन बीत गया और मैं वो धरा छोड़ आया ।
अब मैं वहाँ नहीं जाता और ना ही वहाँ की कोई ख़बर मुझ तक आती है ।
न जाने अब भी वो पेड़ मुझे पुकारते हैं या नहीं ?
पता नहीं वो खिड़कियां अब भी रोज़ सबेरे खुलती हैं या नहीं ?
पता नहीं अब भी उन डालियों पर कोई झूलता हैं या नहीं ?
हो सकता है वो आज भी मुझे ढूंढते हों,
आज भी वो टहनियाँ लहरा कर मुझे पुकारती हों ।
हो सकता है की आज कोई और बाहें उन डालियों पर झूलती हों ।
वो पुष्प कोई और तोड़ता हो ।
मेरे पास उन गुलमौहर को याद करने का वक़्त नहीं है
और पता नहीं उन गुलमौहरों को मैं याद हूँ भी या नहीं ॥
मेरे घर के आगे पहरेदार से खड़े थे ।
सुबह-सुबह जब खिड़की खोलते,
तो अक्सर एक झूलती हुई डाली
एक नया खिला हुआ पुष्प हाथ मैं थमा जाती थी ।
शाम को हवा के हल्के झोंको में,
लहराती हुई टहनियाँ खिड़की पर ऐसे दस्तक देती थी,
मानो खेलने के लिए पुकार रही हो ।
भली भाँति परिचित था मैं,
उन पेड़ो की डालियो, पत्तियों और कलियों से ।
हल्के हरे रंग की नूतन पत्तियां ।
धूल जमी गाड़े हरे रंग की पुरानी पत्तियां
और बूढ़ी होती पीली-भूरी पत्तियां ।
मैं जान ही नहीं पाया, कब एक अंजान सा रिश्ता बन गया
मेरा उन पेड़ों के साथ ।
बचपन बीत गया और मैं वो धरा छोड़ आया ।
अब मैं वहाँ नहीं जाता और ना ही वहाँ की कोई ख़बर मुझ तक आती है ।
न जाने अब भी वो पेड़ मुझे पुकारते हैं या नहीं ?
पता नहीं वो खिड़कियां अब भी रोज़ सबेरे खुलती हैं या नहीं ?
पता नहीं अब भी उन डालियों पर कोई झूलता हैं या नहीं ?
हो सकता है वो आज भी मुझे ढूंढते हों,
आज भी वो टहनियाँ लहरा कर मुझे पुकारती हों ।
हो सकता है की आज कोई और बाहें उन डालियों पर झूलती हों ।
वो पुष्प कोई और तोड़ता हो ।
मेरे पास उन गुलमौहर को याद करने का वक़्त नहीं है
और पता नहीं उन गुलमौहरों को मैं याद हूँ भी या नहीं ॥
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