Monday, November 24, 2008

सीमायें

तुम्हारी सुन्दरता का विवरण करू मैं कैसे ?
मेरी कल्पनायें तो सीमित हैं ।
तुमसे अपने स्नेह को व्यक्त करू मैं कैसे ?
मेरी विवेचनाएँ तो सीमित हैं ।


सावन की पहली फुहार में
अकेले ही भीग गया मैं ।
तुमको निमंत्रण दूँ भी तो कैसे ?
तुम पर मेरे अधिकार तो सीमित हैं ।


दीपक की लौ की भाँती,
इस व्यापक अन्धकार से लडू मैं कैसे ?
मेरे तेजस्कर तो सीमित हैं ।
इस उजडे हुए गुलशन मैं
अब फ़िर से गुल खिलाऊ मैं कैसे ?
मेरे श्रमसाध्य तो सीमित हैं ।

अपने ह्रदय मैं बसी
इन भावानयो को तुम्हे समझाऊ मैं कैसे ?
यह शब्दकोष तो सीमित हैं ।
मरुस्थल की तपित भूमि की भाँती
वर्षा का अनंत इंतज़ार करू मैं कैसे ?
यह जीवनकाल भी तो सीमित हैं ।



Link to my other Blog
http://life-as-it-gets.blogspot.com/

2 comments:

lalit said...

bajut sahi shalabh....very good choice of words...like that.

no_identity said...

Thank you bhaiya.